BREAKING NEWS

तिल्दा-नेवरा से आखिर कहां गायब हो गए कौवे और बाभन चिड़िया?

छत्तीसगढ़ प्रदेश साहू संघ में महेंद्र साहू बने किसान विभाग के प्रदेश उपाध्यक्ष

व्याख्याता विमला भास्कर की राष्ट्रपति के दत्तक पुत्रों पहाड़ी कोरवा जनजाति के छात्रों पर लिखित पुस्तक का महामहिम राज्यपा

एक साहित्यिक बस्ती में देर तक सुनी गई ग़ज़लों की अनुगूँज

तिल्दा-नेवरा में व्यापारियों के लिए जीएसटी और इनकम टैक्स पर मार्गदर्शन शिविर आज

Advertisment

एक साहित्यिक बस्ती में देर तक सुनी गई ग़ज़लों की अनुगूँज : एक साहित्यिक बस्ती में देर तक सुनी गई ग़ज़लों की अनुगूँज

Ramesh Batra

Tue, Jul 7, 2026

महासमुन्द। साहित्यिक और सांस्कृतिक विरासतों के कस्बाई शहर बागबाहरा में अनेक ऐसे कवि और लेखक हुए हैं, जिन्होंने अपने रचनाकर्म से इस बस्ती की पहचान को दूर -दूर तक विस्तारित किया है. ओड़िशा के सीमावर्ती छत्तीसगढ़ के महासमुन्द जिले की यह बस्ती हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार नारायणलाल परमार, सुप्रसिद्ध कवि मेहतर राम साहू और हिन्दी के सुप्रसिद्ध व्यंग्य लेखक गजेन्द्र तिवारी की कर्मभूमि रह चुकी है. स्वर्गीय हरिकृष्ण श्रीवास्तव और शंभू व्योहार की साहित्यिक सृजनशीलता ने भी इस बस्ती का गौरव बढ़ाया है.

वर्तमान में आधुनिक हिन्दी कविता के जाने -माने हस्ताक्षर रजत कृष्ण और पीयूष कुमार अपने गंभीर रचना कर्म से यहाँ की साहित्यिक परम्परा को समृद्ध करते जा रहे हैं. स्वर्गीय मेहतरराम साहू के सुपुत्र धनराज साहू की साहित्यिक -सांस्कृतिक सक्रियता भी यहाँ लगातार बनी हुई है. धनराज ने अपनी संस्था लोक कलाकार संरक्षण समिति के माध्यम से इस वर्ष मई के महीने में छत्तीसगढ़ी गीत -संगीत के नये कलाकारो के लिए यहाँ 8 दिनों का एक प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किया था, जिसमें प्रदेश के विभिन्न जिलों के लगभग 350 कलाकार शामिल हुए थे।

धनराज ने अभी 5 जुलाई को अपनी संस्था साहित्य संदेस और लोक कलाकार संरक्षण समिति की ओर से महासमुन्द जिले के शायरों को आमंत्रित कर ‘ग़ज़लों की गूँज’ कार्यक्रम का आयोजन किया.बागबाहरा के लालपुर स्थित सुरमाल साहू समाज के सभा कक्ष में यह आयोजन हुआ. बारिश के भीगे हुए माहौल में हुई ग़ज़ल संध्या में महासमुन्द के अशोक शर्मा सलीम कुरैशी और श्लेष चंद्राकर, बागबाहरा के हबीब खान ‘समर’ और पिथौरा के प्रवीण ‘प्रवाह’ स्वराज्य करुण और निर्वेश दीक्षित ने अपनी ग़ज़लें पढ़ीं, वहीं धनराज साहू ने छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल सुनाई. पड़ोस के गाँव कोमाखान से आए राजू कोमाखान (राजकुमार अग्रवाल )ने भी काव्य पाठ किया. कोई भी शायर या कवि आम जनता की ज़िन्दगी से जुड़ी गंभीर समस्याओं को अनदेखा नहीं कर सकता. इस मुशायरे में भी सभी कवियों की रचनाओं में सामाजिक विसंगतियों और आर्थिक विषमताओं से समाज में उपजते दुःख -दर्द की अनुगूँज सुनी गई. हम सबके आस पास घटित अप्रिय घटनाओ को भी कवियों ने रेखांकित किया.

शुरुआत में हबीब खान समर आए. उन्होंने अपनी इस ग़ज़ल से समां बाँधा –

*ज़िन्दगी को नया मोड़ देना पड़ा,

कसमें, वादे, वफ़ा तोड़ देना पड़ा.

जब चमन को किसी की ज़रूरत नहीं,

बागबाँ को चमन छोड़ देना पड़ा.*

सलीम कुरैशी की इन पंक्तियों ने भी श्रोताओं को कुछ सोचने के लिए मज़बूर कर दिया –

*इज़्ज़तो अदब का तरीक़ा भूल चुके हैं.

अब बात तो करते हैं लोग सलीक़ा भूल चुके हैं.*

श्लेष चंद्राकर की ग़ज़लों की इन पंक्तियों ने भी काफी प्रशंसा अर्जित की

तेरे धोखे से अनजान हमारा क्या है

हम भोले-भाले इन्सान हमारा क्या है

हमने सीखा है नेकी पर चलना हरदम

तुम बेचो अपना ईमान हमारा क्या है

वहीं प्रवीण ‘प्रवाह’ की ग़ज़लों का स्वर भी काफी प्रभावी रहा –

*लोगों को तो उत्सव का अवसर लगता है,

आतिशबाजी से चिड़ियों को डर लगता है।

जिसके होंठों पे मीठी मुस्कान नहीं है,

उसके हाथों का ग़ुलाब पत्थर लगता है।*

अशोक शर्मा की ग़ज़ल की इन पंक्तियों में भी आज के समय की अप्रिय सच्चाई को लोगों ने महसूस किया –

*ठौर कोई न कोई डेरा है,

वक़्त बेघर हैं बेबसेरा है।

मंत्र साँपों ने इस तरह साधा,

बीन पर नाचता सपेरा है।*

अशोक शर्मा ने अपनी एक ग़ज़ल की इन लाइनों से भी आज के हालात पर तीखा व्यंग्य किया –

*मानवता बैठी है लज्जित

लाज लुटाकर नकटी में,

नकटे नंगा नाच रहे हैं

नाक कटाकर नकटी में।*

स्वराज्य करुण ने अपनी ग़ज़ल में वर्तमान दौर के दुःखद वातावरण का चित्रण किया –

*उजड़ते हैं कई घर, उजड़ती हैं बस्तियाँ

फिर भी कम होती नहीं उनकी मस्तियाँ.

उनको चाहिए जगह ख़ूब लम्बी चौड़ी

सियासत में मगन हैं जो बेखौफ़ हस्तियाँ* .

पिथौरा से आए नवोदित कवि निर्वेश दीक्षित ने अपनी रचना में आज के युग की सच्चाई को कुछ इस तरह पेश किया –

*मैं जब जब कलम उठाता हूँ,

तब -तब मैं सच लिखता हूँ.

जब -जब मैं सच लिखता हूँ

मैं अपराधी -सा दिखता हूँ.

मुशायरे के संयोजक धनराज साहू की छत्तीसगढ़ी ग़ज़ल में मिट्टी की सोंधी महक महसूस की गई. उनकी दो पंक्तियों पर ध्यान दीजिए –

*कलेचुप आँसू ल मैं

आँखी के झरा देथँव

जब निकलथँव मैं डहर ले

त मुस्कुरा देथँव.*

बागबाहरा बस्ती के काव्य रसिकों के लिए ग़ज़लों की यह शाम यादगार बन गई.सभी कवियों की रचनाओं पर सभाकक्ष में करतल ध्वनि देर तक होती रही.कार्यक्रम में बागबाहरा नगर पालिका के उपाध्यक्ष देवेश साहू मुख्य रूप से उपस्थित रहे। उनके साथ-साथ जनक साहू, जसवंत भारती, सी.पी. तिवारी, लायक राम, पांडेय जी, अविनाश जी, चेतन महाराज, अनुराग द्विवेदी सहित बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी नागरिक भी मुशायरे के आख़िर तक बने रहे । सभी लोगों ने इस आयोजन की प्रशंसा की.आयोजन की याद में सभी शायरों और काव्य रसिकों ने सामूहिक रूप से तस्वीर भी खिंचवाई।

विज्ञापन

विज्ञापन

जरूरी खबरें