श्राद्ध पक्ष में कौवों को खोजते रह जाते हैं लोग, : तिल्दा-नेवरा से आखिर कहां गायब हो गए कौवे और बाभन चिड़िया?
Ramesh Batra
Mon, Jul 27, 2026

तिल्दा-नेवरा। कभी तिल्दा-नेवरा की गलियों, खेतों, तालाबों और पेड़ों पर आसानी से दिखाई देने वाले कौवे (कांव-कांव करने वाले पक्षी) और स्थानीय भाषा में बाभन चिड़िया अब लगभग लुप्त होते नजर आ रहे हैं। स्थिति यह है कि पूरे दिन शहर में एक भी कौवा दिखाई नहीं देता। इसे लेकर नागरिकों में चिंता बढ़ती जा रही है।
स्थानीय बुजुर्ग बताते हैं कि कुछ वर्ष पहले तक सुबह होते ही घरों की छतों और पेड़ों पर कौवों की आवाज सुनाई देती थी। श्राद्ध पक्ष के दौरान लोग पितरों के निमित्त सबसे पहले कौवों को भोजन कराते थे, लेकिन अब श्राद्ध के समय लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता है और कई बार एक भी कौवा दिखाई नहीं देता।
दिलचस्प बात यह है कि केवल शहरीकरण को इसका कारण मानना भी आसान नहीं है। यदि केवल शहरीकरण ही वजह होता, तो पुणे, नाशिक, रायपुर या अन्य बड़े शहरों में भी यही स्थिति देखने को मिलती। लेकिन वहां आज भी कौवे सामान्य रूप से दिखाई देते हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर तिल्दा-नेवरा से ही ये पक्षी क्यों गायब हो रहे हैं?
विशेषज्ञों के अनुसार पक्षियों की संख्या कम होने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं, जिनमें पेड़ों की कटाई, प्राकृतिक आवास का खत्म होना, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, भोजन और पानी के स्रोतों की कमी, बढ़ता प्रदूषण तथा पर्यावरणीय बदलाव शामिल हैं। हालांकि, तिल्दा-नेवरा में कौवों और अन्य पक्षियों की संख्या में आई कमी का वास्तविक कारण जानने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन और वन विभाग की जांच आवश्यक होगी।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि नगर में बड़े पेड़ों का संरक्षण, नए पौधों का रोपण, पक्षियों के लिए पानी और दाना रखने की परंपरा को बढ़ावा देना तथा रासायनिक कीटनाशकों के अनियंत्रित उपयोग पर नियंत्रण जैसे कदम पक्षियों के संरक्षण में सहायक हो सकते हैं।
स्थानीय नागरिकों ने वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों से मांग की है कि तिल्दा-नेवरा क्षेत्र में कौवों एवं अन्य पक्षियों की घटती संख्या का सर्वे कराया जाए, ताकि इसके वास्तविक कारणों का पता लगाया जा सके और समय रहते संरक्षण के प्रभावी उपाय किए जा सकें।
कभी कौवों की कांव-कांव से गूंजने वाला तिल्दा-नेवरा आज उनकी एक झलक के लिए तरस रहा है। यह केवल एक पक्षी के गायब होने का मामला नहीं, बल्कि बदलते पर्यावरण का एक गंभीर संकेत भी हो सकता है।
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