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धड़ल्ले से चल रहा सट्टा बाजार, सिस्टम लाचार : नम्बरों के खेल से युवाओं की बर्बादी का कौन जिम्मेदार

Ramesh Batra

Sun, Apr 13, 2025

तिल्दा-नेवरा!

नम्बरों का खेल भी गजब होता है, खिलाने वाले को आबाद कर देता है, मगर खेलने वाले का घर-बार बिकवा कर भी नहीं छोड़ता। कईयों को तो आत्महत्या कर देनी पड़ी इस चक्रव्यूह के चलते।सट्टे की लत ने शहर के हजारों परिवार तबाह कर दिए हैं। कई लोग कर्ज तले दबे हैं, कई की जमीन, मकान, दुकान, घर का सामान तक बिक गया।

कॉम्पिटिशन की दुनिया में पैसा कमाना पहले जैसा आसान नहीं रह गया है, दूसरी तरफ चकाचौंध और हकीकत से दूर बड़े सपने पालने वाले युवाओं को बड़ा पैसा चाहिए। बड़ी रकम के लिए बड़ी मेहनत की जरूरत है, मगर वह आज के युवा करना नहीं चाहते। उन्हें हर चीज के लिए शार्ट-कट चाहिए होते हैं। इसी के चलते उन्हें स्टॉक मार्केट और सट्टा बाजार का रास्ता ही आसान महसूस होता है। यहाँ चंद पैसे लगाकर कभी कभार किस्मत से लाखों बन जाएं, तो फिर इसकी लत लग जाती है उन्हें, और फिर इन्हें करोड़ों में बदलने की चाह में जीते हुए लाखों तो चले ही जाते हैं, अपनी जमा पूँजी और मकान तक दाँव पर लगा देते हैं।

आजकल सट्टे के नाम से कई एप्प के नाम सामने आ रहे हैं, लेकिन विश्वस्त सूत्रों से पता चला है कि गली कूचों में छोटे-बड़े सटोरिये तेजी से सक्रिय होते जा रहे हैं। नगर के इकलौते ओवरब्रिज के आसपास भी सट्टा खिलाने वाला गिरोह सक्रिय होने की पुख्ता खबर मिली है। बड़े खिलाड़ी तो एप्प के जरिये पैसा लगाते हैं, मगर मजदूर वर्ग के लोग आज भी नम्बरों पर सट्टा खेलते हैं। पता चला है कि इनकी पहुँच बड़े लेवल तक है। यहाँ तक सुना गया है कि यह व्यक्ति समूह डंके की चोट पर कहता है कि जहाँ शिकायत करनी हो, कर लो। वह कहते हैं कि उनका पैसा ऊपर से नीचे तक जाता है, उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। आखिर पुलिस क्यों मौन है, यह सवाल बार-बार आता है। पता चला है कि बड़े सफेदपोश भी इस नम्बर-गेम में शामिल हैं।

पुलिस कार्रवाई करती है, लेकिन तब जब बड़े अफसरों को सट्टा चालू होने की भनक लग जाए। कुछ दिन बाद फिर सट्टे के अड्डे चालू हो जाते हैं। जाहिर है- पुलिस की जब मर्जी होती है तभी सट्टा चलता है, जब मर्जी होती है तो सट्टा बंद होता है। हमारी टीम  ने सट्टे के काले कारोबार की पड़ताल की, जो बताता है- सिस्टम पूरी तरह इस काले धंधे में शामिल है, यही वजह है- सट्टा माफिया पनप रहा है।बहरहाल अभी इस सामाजिक बुराई और दलदल को समाप्त करना बेहद जरुरी है, वरना काफी हद तक युवा पीढ़ी इस दलदल में धँसकर बर्बाद होते जाएगी।

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