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एक व्यंग : कलम छोड़ अब डंडा थामेंगे गुरुजी? तिल्दा नेवरा में शिक्षा का 'डॉग-स्कैन' मॉडल!

तिल्दा नेवरा: हमारे देश में कहा जाता है कि शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है। लेकिन प्रशासन को लगता है कि "राष्ट्र निर्माण" का काम तो होता रहेगा, पहले मोहल्ले के शेरू और टॉमी का "आधार कार्ड" बन जाना ज्यादा जरूरी है।

जी हाँ, आपने सही सुना! तिल्दा नेवरा में अब शिक्षकों को कुत्तों की निगरानी का जिम्मा सौंपा गया है। यह फैसला सुनकर न केवल शिक्षक हैरान हैं, बल्कि शायद कुत्ते भी सोच रहे होंगे कि "भाई, हमने कौन सा होमवर्क नहीं किया था जो मास्टर साहब अब हमारे पीछे पड़ गए हैं?"

व्यंग्य: "चाणक्य, तुम गलत थे!"

- "शिक्षक कभी साधारण नहीं होता, प्रलय और निर्माण उसकी गोद में पलते हैं।"

लेकिन तिल्दा नेवरा के प्रशासन ने इसे अपडेट कर दिया है- "शिक्षक साधारण नहीं होता, जनगणना और कुत्ते की गणना उसकी गोद में पलते हैं।"

विडंबना देखिए, जिस हाथ में चॉक और डस्टर होना चाहिए, जो हाथ बच्चों का भविष्य संवारने के लिए उठने चाहिए, अब उन हाथों को यह गिनने में लगाया जाएगा कि किस गली में कितने कुत्ते घूम रहे हैं। शायद प्रशासन को लगता है कि शिक्षकों ने B.Ed और D.Ed की डिग्री इसलिए ली थी ताकि वे कुत्तों की नस्ल और उनकी आबादी का डेटाबेस तैयार कर सकें।

शिक्षकों का दर्द: "पढ़ाना छोड़कर सब करवा लो"

शिक्षकों के पक्ष में यह सवाल पूछना लाजिमी है:

  • चुनाव ड्यूटी? शिक्षक करेंगे।

  • जनगणना? शिक्षक करेंगे।

  • टीकाकरण अभियान? शिक्षक करेंगे।

  • और अब कुत्ते गिनना? वह भी शिक्षक ही करेंगे!

बस एक "पढ़ाना" ही ऐसा काम बचा है, जो शिक्षकों के लिए "ऑप्शनल" होता जा रहा है। स्कूल में बच्चा '' से कबूतर सीखे या न सीखे, लेकिन प्रशासन चाहता है कि मास्टर साहब को '' से कुत्ता जरूर पता होना चाहिए।

क्या अब सिलेबस भी बदलेगा?

अगर यही हाल रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब स्कूलों के टाइम-टेबल में गणित और विज्ञान की जगह नए विषय जुड़ जाएंगे:

1.   कुत्ता-मनोविज्ञान (Dog Psychology): भौंकने का सही समय।

2.   दौड़-भाग 101: कुत्ते के पीछे भागने की कला।

3.   फील्ड वर्क: आवारा कुत्तों की सही गिनती कैसे करें?

निष्कर्ष:

यह फरमान न केवल हास्यास्पद है, बल्कि उस 'गुरु' की गरिमा का अपमान है जिसे हम भगवान से भी ऊपर का दर्जा देते हैं। प्रशासन को समझना होगा कि शिक्षकों का काम बच्चों के दिमाग को विकसित करना है, न कि सड़कों पर जानवरों की निगरानी करना। अगर मास्टर साहब कुत्तों की निगरानी में ही व्यस्त रहेंगे, तो फिर बच्चों की निगरानी कौन करेगा?

शिक्षकों को "कुत्ता-मित्र" बनाने के बजाय, उन्हें "छात्र-मित्र" ही रहने दें, तो देश का भला होगा। वरना भविष्य में बच्चे निबंध लिखेंगे— "हमारे शिक्षक ने कक्षा में कम और गली में ज्यादा समय बिताया।"


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